सिरसा, 22 जुलाई।
जहां कभी खारे पानी और लवणीय भूमि के कारण खेती करना मुश्किल माना जाता था, वहीं सिरसा जिले के गांव कर्मशाना की गृहिणी सुमित्रा ने उसी चुनौती को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना दिया। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत मिली सरकारी सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने झींगा पालन में ऐसी सफलता हासिल की कि आज उनका नाम जिले की प्रेरणादायक महिला उद्यमियों में लिया जाता है।
सुमित्रा की यह यात्रा केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण भी है कि यदि सही मार्गदर्शन, सरकारी योजनाओं का लाभ और दृढ़ संकल्प साथ हो तो प्रतिकूल परिस्थितिथियों में भी सफलता मिल सकती है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से खारे पानी वाले क्षेत्रों में झींगा पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे सिरसा जैसे जिलों में किसानों की आय बढ़ाने के नए अवसर विकसित हुए हैं।
परंपरागत खेती छोड़ अपनाया नया रास्ता
सुमित्रा का परिवार पहले पारंपरिक खेती पर निर्भर था, लेकिन क्षेत्र में भूजल की अधिक लवणता और नहरी पानी की कमी के कारण खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही थी। इसी दौरान उन्होंने समाचार पत्रों और यूट्यूब के माध्यम से झींगा पालन के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस व्यवसाय की संभावनाओं को समझने के बाद उन्होंने मत्स्य विभाग से संपर्क किया, जहां उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण मिला।
पीएमएमएसवाई से मिली आर्थिक मदद
वर्ष 2021 में सुमित्रा ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत आवेदन किया। लगभग 14 लाख रुपये की परियोजना पर उन्हें 8.35 लाख रुपये की सब्सिडी प्रदान की गई। इस सहायता से उन्होंने एक हेक्टेयर क्षेत्र में दो झींगा तालाब स्थापित किए और वैज्ञानिक तरीके से सफेद झींगा का उत्पादन शुरू किया।
मत्स्य विभाग तथा एक्वाकल्चर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, हिसार से मिले प्रशिक्षण ने उन्हें आधुनिक तकनीकों, जल गुणवत्ता प्रबंधन, जैव सुरक्षा (बायो-सिक्योरिटी) और वैज्ञानिक फीड प्रबंधन की जानकारी दी, जिससे उत्पादन बेहतर हुआ।
वैज्ञानिक तकनीक बनी सफलता की कुंजी
सुमित्रा ने झींगा पालन में पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धति अपनाई। प्रमाणित हैचरी से गुणवत्तायुक्त बीज, संतुलित स्टॉकिंग घनत्व, नियमित जल परीक्षण, उच्च गुणवत्ता वाले फीड तथा आईओटी आधारित फीडर जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया। इसी वैज्ञानिक प्रबंधन के कारण उन्होंने रोग नियंत्रण और जल गुणवत्ता जैसी चुनौतियों पर भी सफलतापूर्वक विजय प्राप्त की।
14 लोगों को मिला रोजगार, महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा
पहले ही वर्ष में सुमित्रा ने लगभग 10 टन झींगा उत्पादन किया और करीब 19 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया। इस सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने दूसरे वर्ष दो और तालाब तैयार किए, जिसके लिए उन्हें लगभग 8.40 लाख रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी मिली। इसके बाद उनका वार्षिक उत्पादन बढकऱ 20 टन तक पहुंच गया। वित्तीय वर्ष 2023-24 में उनके उद्यम का वार्षिक कारोबार लगभग 68 लाख रुपये दर्ज किया गया। उनके फार्म से चार लोगों को प्रत्यक्ष तथा दस लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिला। सुमित्रा की सफलता ने कर्मशाना ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के किसानों और महिलाओं को भी नई दिशा दिखाई है। गांव में अब तक लगभग 115 एकड़ क्षेत्र में झींगा पालन अपनाया जा चुका है। आज अनेक महिलाएं भी पारंपरिक खेती से आगे बढकऱ मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर के क्षेत्र में रुचि दिखा रही हैं।
राष्ट्रीय स्तर तक मिली पहचान
सुमित्रा अब अपने फार्म का विस्तार कर अधिक तालाब विकसित करने और आधुनिक एक्वाकल्चर तकनीकों को अपनाने की योजना बना रही हैं। उनका मानना है कि वैज्ञानिक सोच, सरकारी योजनाओं का प्रभावी उपयोग और निरंतर सीखने की इच्छा से ग्रामीण महिलाएं भी बड़े उद्यम स्थापित कर सकती हैं। सुमित्रा की कहानी यह संदेश देती है कि प्राकृतिक चुनौतियां यदि अवसर में बदली जाएं तो वही भूमि, जिसे कभी कम उपजाऊ माना जाता था, रोजगार, आय और महिला सशक्तिकरण का मजबूत आधार बन सकती है। सुमित्रा की सफलता ने राष्ट्रीय स्तर पर भी विशेष पहचान बनाई है। वर्ष 2023 में पूर्व सांसद सुनीता दुग्गल द्वारा उनकी सफलता की कहानी सोशल मीडिया पर साझा की। वहीं उनकी सफलता की कहानी को नाबार्ड ने भी सुपर सक्सेस स्टोरी के लिए नामांकित किया, जिससे वे मत्स्य पालन के क्षेत्र में अन्य किसानों और विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गई हैं।
खारे पानी को बनाया कमाई का जरिया: कर्मशाना की सुमित्रा बनीं झींगा पालन में महिला सशक्तिकरण की मिसाल









