अम्बाला/चंडीगढ़, 26 अप्रैल 2026 — हरियाणा में नगर निकाय चुनाव से ठीक पहले राज्य निर्वाचन आयोग के एक पत्र ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर गंभीर विवाद खड़ा कर दिया है। 23 अप्रैल को जारी इस पत्र के एक बिंदु ने न केवल प्रशासनिक हलकों में बल्कि कानूनी और सामाजिक मंचों पर भी तीखी बहस छेड़ दी है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता हेमंत कुमार ने इस मुद्दे को उठाते हुए राज्य के शीर्ष अधिकारियों—राज्य निर्वाचन आयुक्त, शहरी स्थानीय निकाय विभाग और विधि विभाग—को एक विस्तृत ज्ञापन भेजकर इस “भ्रमित और संभावित भेदभावपूर्ण” स्थिति पर तत्काल स्पष्टीकरण मांगा है।
क्या है पूरा विवाद?
राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 12 जिलों—अम्बाला, पंचकूला, सोनीपत, फतेहाबाद, हिसार, कैथल, करनाल, झज्जर, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, रोहतक और यमुनानगर—के उपायुक्तों को भेजे गए निर्देशों में कहा गया है कि:
· अन्य राज्यों से आए एस.सी. व्यक्तियों को हरियाणा में एस.सी. आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
· दूसरे राज्य की एस.सी. महिला, यदि हरियाणा के नॉन-एस.सी. पुरुष से विवाह करती है, तो उसे भी आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
यहीं से शुरू हुआ बड़ा सवाल
ज्ञापन में सबसे बड़ा सवाल यही उठाया गया है कि:
क्या इसका मतलब यह है कि अगर कोई दूसरे राज्य की एस.सी. महिला हरियाणा के एस.सी. पुरुष से विवाह करती है, तो उसे आरक्षण मिल सकता है?
अगर हां, तो फिर नॉन-एस.सी. पुरुष से विवाह करने पर उसे यह अधिकार क्यों नहीं?
‘दोहरे मापदंड’ का सीधा आरोप
अधिवक्ता हेमंत कुमार ने तीखा सवाल उठाया है:
“क्या एक ही वर्ग की महिलाओं के साथ सिर्फ उनके पति की जाति के आधार पर अलग-अलग व्यवहार करना संविधान की भावना के खिलाफ नहीं है?”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि:
· या तो सभी मामलों में ऐसी महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिले,
· या फिर किसी को भी न मिले,
· लेकिन पति की जाति के आधार पर भेदभाव पूरी तरह अनुचित और असंवैधानिक है।
कानूनी चुनौती के संकेत
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि आयोग जल्द स्पष्टता नहीं देता, तो यह मामला अदालत तक जा सकता है।
यह मुद्दा सीधे तौर पर समानता के अधिकार और आरक्षण नीति की व्याख्या से जुड़ा हुआ है।
आयोग से तत्काल जवाब की मांग
ज्ञापन में मांग की गई है कि:
· इस विवादित बिंदु पर आधिकारिक और स्पष्ट स्पष्टीकरण तुरंत जारी किया जाए
· ताकि चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार का भ्रम या भेदभाव न हो
राजनीतिक और सामाजिक असर
नगर निकाय चुनाव से पहले उठे इस विवाद ने राजनीतिक माहौल भी गर्म कर दिया है।
महिला अधिकारों और आरक्षण नीति को लेकर यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।
निष्कर्ष:
हरियाणा में एस.सी. महिलाओं के आरक्षण अधिकार को लेकर उठा यह विवाद केवल एक प्रशासनिक स्पष्टीकरण का मामला नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय की कसौटी बन चुका है। अब नजरें राज्य निर्वाचन आयोग पर टिकी हैं—क्या वह इस “भ्रम” को दूर करेगा या विवाद और गहराएगा?




